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तुम ने जब घर में अंधेरों को बुला रक्खा है
जिस आईने में भी झाँका नज़र उसी से मिली
तू न था तेरी तमन्ना देखने की चीज़ थी
उल्फ़त के फ़साने माज़ी के
कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ
जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम
पोशीदा सब की आँख से दिल की किताब रख
रोज़ ख़्वाबों में आ के चल दूँगा
कुछ शौक़ था यार फ़क़ीरी का
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