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पिया करते हैं छुप कर शैख़ जी रोज़ाना रोज़ाना
रोज़ ख़्वाबों में आ के चल दूँगा
तमाम रास्ता वो मुझ से दूर दूर रहा
क्या याद कर के रोऊँ कि कैसा शबाब था
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
जज़्बात पर अपने इस कदर भी ना काबू रखो
चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था
ग़म का इज़हार भी करने नहीं देती दुनिया
एक रंगीन कहानी है तेरे शहर की रात
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