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ख़मोश क्यों हैं नज़ारों को देखने वाले
दुनिया में यूँ तो हर कोई
तुम से दो हर्फ़ का ख़त भी नहीं लिक्खा जाता
उन से हम लौ लगाए बैठे हैं
दुखों की झील नहीं है तो ज़िंदगी क्या है
लब पे इक नाम जब आता है तो रो लेते हैं
नज़र में अपनी कभी इस क़दर बुरा तो न था
कब अपनी ख़ुशी से वो आए हुए हैं
दिल को इसी सबब से है इज़्तिराब शायद
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