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तमाम रास्ता वो मुझ से दूर दूर रहा
ख़्वाब में गर कोई कमी होती
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
नज़र बचा के नज़र से गुज़र गया वो शख़्स
बहुत तज़्किरा दास्तानों में था
हुस्न से आँख लड़ी हो जैसे
बे-निशान क़दमों की कहकशाँ पकड़ते हैं
जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में
ग़मों से रिश्ता है अपना भी दोस्ती की तरह
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