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कभी होने से कभी दुख के न होने से हुआ
चेहरों को बे-नक़ाब समझने लगा था मैं
बहुत दिनों से खुला दरतलाश करता हूँ
इसी ख़याल से तर्क उन की चाह कर न सके
नज़र का मिल के टकराना न तुम भूले न हम भूले
मोहब्बत ये बता क्या सिलसिला है
जब तक मिज़ाज-ए-दोस्त में कुछ बरहमी रही
साक़िया एक नज़र काफ़ी है बस अब के बरस
सांस लेते हैं जब गहरी दर्द और बढ़ जाता है
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