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जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में
दिल नया है न है ख़याल नया
इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
देख कर दिल-कशी ज़माने की
ऐ बुझे रंगों की शाम अब तक धुआँ ऐसा न था
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
बहुत दिनों से खुला दरतलाश करता हूँ
जले चराग़ बुझाने की ज़िद नहीं करते
याद जो आए ख़ुद शरमाएँ उफ़ री जवानी हाए ज़माने
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