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मोहब्बत ये बता क्या सिलसिला है
ज़ुल्फ़ घटा बन कर रह जाए आँख कँवल हो जाए
मोहब्बत ही अगर तुझ को न रास आई तो क्या होगा
किस लिए फिरता हूँ तन्हा न किसी ने पूछा
बनाए कितने फ़साने मेरे फ़साने से
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता
क़दम ज़मीं पे न थे राह हम बदलते क्या
हर क़दम पर नए साँचे में ढल जाते हैं लोग
लम्हा वो तेरी याद का ऐसे गुज़र गया
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