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तुम से बिछड़ गए तो किसी से मिले न हम
सभी की थी नज़र इस पर गरेबानों पे क्या गुज़री
दे गया आख़िरी सदा कोई
कुछ शौक़ था यार फ़क़ीरी का
तुम ने जब घर में अंधेरों को बुला रक्खा है
मेरा बचपन ही मुझे याद दिलाने आए
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था
न तुम आए न शब-ए-इंतिज़ार गुज़री है
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