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न जाने वादे का क्यों एतिबार अब भी है
उस को भी हम से मोहब्बत हो ज़रूरी तो नहीं
दिल को समझाओ ज़रा इश्क़ में क्या रक्खा है
कुछ शौक़ था यार फ़क़ीरी का
दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं
बहुत तज़्किरा दास्तानों में था
ढूँढ़ने पे भी दिल का निशाँ नहीं मिलता
अगर यक़ीं नहीं आता तो आज़माए मुझे
इधर भी आएँ कभी धूप के सताए हुए
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