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सुन के मेरे इश्क़ की रूदाद को
उन से हम लौ लगाए बैठे हैं
मुझ को जब ग़ौर से तकते हैं ज़माने वाले
ज़माने का भरोसा क्या अभी कुछ है अभी कुछ है
खबर है कि नहीं है
हाथ ख़ाली हैं तेरे शहर से जाते जाते
रोज़ ख़्वाबों में आ के चल दूँगा
जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई
ग़मों से रिश्ता है अपना भी दोस्ती की तरह
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