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मायूसी की बर्फ़ पड़ी थी लेकिन मौसम सर्द न था
इतना रो चुके अरमान मेरे कि अब वो मुझे ना रुलाते हैं
मुझ को जब ग़ौर से तकते हैं ज़माने वाले
दुखों की झील नहीं है तो ज़िंदगी क्या है
राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया
फिर कोई हादिसा हुआ ही नहीं
ज़माने का भरोसा क्या अभी कुछ है अभी कुछ है
दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं
तन्हाइयाँ जो रास न आएँ तो क्या करें
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