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ऐ बुझे रंगों की शाम अब तक धुआँ ऐसा न था
पन्ने यादो की किताब के जब भी हम पलटते हैं
आ गया वक़्त कि हो दावत-ए-आम ऐ साक़ी
दिल की हालत बयाँ नहीं होती
जब तक मिज़ाज-ए-दोस्त में कुछ बरहमी रही
कश्ती के मुसाफिर को तूफ़ानो से क्या डराते हो
तन्हाइयाँ जो रास न आएँ तो क्या करें
तड़प रहा है दिल-ए-बे-क़रार आ जाओ
बिछा हुआ कोई तन्हाइयों का जाल न था
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