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हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं
ज़माने का भरोसा क्या अभी कुछ है अभी कुछ है
सहरा में तन्हा झुलसा बैठा बारिश का इंतज़ार करता हूँ
दश्त की तेज़ हवाओं में बिखर जाओगे क्या
सांस लेते हैं जब गहरी दर्द और बढ़ जाता है
कोई सोचे न हमें कोई पुकारा न करे
आ गया वक़्त कि हो दावत-ए-आम ऐ साक़ी
मोहब्बत ही अगर तुझ को न रास आई तो क्या होगा
क्या आँख मिलाओगे तुम देखने वालों से
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