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सिर्फ एक बार मोका देदे
मुझ को जब ग़ौर से तकते हैं ज़माने वाले
मोहब्बत की वो आहट पा न जाए
उन से हम लौ लगाए बैठे हैं
साज़िश छुपा रहा है चाँद
तुझ को देखा तो मेरी आँख ने देखा मुझ में
दिन ढला बढ़ने लगीं परछाइयाँ
हर क़दम पर नए साँचे में ढल जाते हैं लोग
वो अपने इश्क़ में कैसा कमाल रखता है
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