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ख़ुशी का एक लम्हा चाहिए था
हाए अब कौन लगी दिल की बुझाने आए
जब इश्क तुम्हें हो जाएगा
गुज़रे जो अपने यारों की सोहबत में चार दिन
जब भी कमरे में कुछ हवा आई
मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी
यूँ तसव्वुर में खिले गुल हैं तेरी बात के बाद
पिया करते हैं छुप कर शैख़ जी रोज़ाना रोज़ाना
कल चौदवीं की रात थी
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