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ख़त्म है बादल की जब से साएबानी धूप में
डूबने वालो हवाओं का हुनर कैसा लगा
आ गया वस्ल में उन को जो पसीना ठंडा
हल्का हल्का सुरूर है साक़ी
मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी
ख़्वाबों के किसी मोड़ पे देखा सा लगे है
कौन होते हैं वो महफ़िल से उठाने वाले
तू काश मिले मुझ को अकेली तो बताऊँ
पिया करते हैं छुप कर शैख़ जी रोज़ाना रोज़ाना
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