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नज़र बचा के नज़र से गुज़र गया वो शख़्स
तू अजब याद आया
आ गया वस्ल में उन को जो पसीना ठंडा
हल्का हल्का सुरूर है साक़ी
मोहब्बत कर के शर्मिंदा नहीं हूँ
नहीं मालूम अब की साल मय-ख़ाने पे क्या गुज़रा
ताज्जुब ये नहीं है ग़म के मारों को न चैन आया
सावन की पुर्वाई ने क्या दुखती चोट दिखाई है
हाए अब कौन लगी दिल की बुझाने आए
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