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दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं
बे-क़स्द सफ़र जाते हैं मा’लूम नहीं क्यूँ
दर्द भी उस ने दिया इश्क़ के पैग़ाम के साथ
रंज की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यों नहीं आता
दिल में क्या था जो खो गया है कहीं
मेरे ख़ुदा मुझे इतना तो क़ाबिल कर दे
तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था
आज तो रोने को जी हो जैसे
अपनी मजबूरी बताता रहा रो रो कर मुझ को
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