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फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी
बेवफ़ा, वा’दा-शिकन और सितमगर निकला
दश्त-ए-तन्हाई में कल रात हवा कैसी थी
रंज की क़ैद से आज़ाद हो कर क्यों नहीं आता
आहें मुँह से मेरे निकलने दो
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
हम ने लिक्खे थे हवाओं में फ़साने अपने
हमें तो एक ही चेहरा दिखाई देता है
ज़मीं पे आग फ़लक पर धुआँ दिखाई दिया
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