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जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई
अजनबी रहगुज़र के थे ही नहीं
किस पे क़ुर्बान किसे याद हुए थे हम भी
ये इश्क़ की है राह न यूँ डगमगा के चल
आग ही काश लग गई होती
कभी होने से कभी दुख के न होने से हुआ
आज रोना आया
गजब ये भी किसी और पर नहीं आया
लुट गया चैन तेरे जाने से
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