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कल चौदवीं की रात थी
अदा परियों की सूरत हूर की आँखें ग़ज़ालों की
वो जो हर राह के हर मोड़ पर मिल जाता है
आज अचानक फिर ये कैसी ख़ुशबू फैली यादों की
लम्हा लम्हा दस्तक दे कर तड़पाता है जाने कौन
एक परी की ज़ुल्फ़ों में यूँ फँसा हुआ है चाँद
घर की कैद से उसे फ़ुर्सत मिले तो आए भी
जब भी कमरे में कुछ हवा आई
चेहरे पे इंतिज़ार की परछाइयाँ मिलीं
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