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बिछा हुआ कोई तन्हाइयों का जाल न था
इधर भी आएँ कभी धूप के सताए हुए
घुप अंधेरे में उजालों की तरह मिलता है
हल्का हल्का सुरूर है साक़ी
कब तक रहूँ मैं ख़ौफ़-ज़दा अपने आप से
फिरते हैं जिस के वास्ते हम दर-ब-दर अभी
It’s Happening
अभी ना आओ छोड़ कर
अंजाम नहीं होता
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