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सर-ए-शाम वो कभी आएँ तो
मुस्कुराते हैं हम
कहीं आह बन के लब पर तेरा नाम आ न जाए
तेरी गली में तमाशा किए ज़माना हुआ
ग़म का इज़हार भी करने नहीं देती दुनिया
O Spring, Do Not Torture Me
ख़ुद-ब-ख़ुद आँख बदल कर ये सवाल अच्छा है
बे-निशान क़दमों की कहकशाँ पकड़ते हैं
So Deep, Deeper Than A River
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