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हमीं से तोड़ के रिश्ता सफ़र पे निकला है
बहुत दिनों से खुला दरतलाश करता हूँ
हर्फ़ों का दिल काँप रहा है
करना जो मोहब्बत का इक़रार समझ लेना
शब वही लेकिन नज़ारा और है
बात चुप रह के भी करती हैं तुम्हारी आँखें
क्या ये देखें कि कोई और तमाशा क्या है
बे-निशान क़दमों की कहकशाँ पकड़ते हैं
सन्नाटे का दर्द निखारा करता हूँ
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